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Compassionate King| दयालु राजा

दयालु राजा ( Compassionate King) भावनगर के राजा एक बार गर्मियों के दिनों में अपने आम के बागों में आराम कर रहे थे और वह बहुत ही खुश थे की उनके बागों में बहुत अच्छे आम लगे थे और ऐसे ही वो अपने खयालों में खोये हुए थे । तब वहाँ से एक ग़रीब किसान गुज़र रहा था और वह बहुत भूखा था, उसका परिवार पिछले दो दिन से भूखा था तो उसने देखा की क्या मस्त आम लगे है अगर मैं यहाँ से कुछ आम तोड़ कर ले जाऊँ तो मेरे परिवार के खाने का बंदोबस्त हो जाएगा  । यह सोच कर वह उस बाग़ में घुस गया उसे पता नहीं था की इस बाग़ में भावनगर के राजा  आराम कर रहे हैं  वो तो चोरी छुपे घुसते ही एक पत्थर उठा कर आम के पेड़ पे लगा दिया और वह पत्थर आम के पेड़ से टकराकर सीधा राजाजी के सर पे लगा  । राजाजी का पूरा सर खून से लत पथ हो गया और वो अचानक हुए हमले से अचंभित थे और उन्हें यह समझ ही नहीं आ रहा था की आखिर उनपर हमला किसने किया  । राजा ने अपने सिपाहियों को आवाज़ दी तो सारे सिपाही दोड़े चले आयें और राजाजी का यह हाल देख उन्हें लगा की किसी ने राजाजी पे हमला किया है तो वह बागीचे के चारों तरफ आरोपी को ढूढ़न...

Taste of salt - Motivational Story In Hindi

नमक का स्वाद एक बार एक परेशान और निराश व्यक्ति अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला – “गुरूजी मैं जिंदगी से बहुत परेशान हूँ| मेरी जिंदगी में परेशानियों और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं है| कृपया मुझे सही राह दिखाइये|” गुरु ने एक गिलास में पानी भरा और उसमें मुट्ठी भर नमक डाल दिया| फिर गुरु ने उस व्यक्ति से पानी पीने को कहा| उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया| गुरु :- इस पानी का स्वाद कैसा है ?? “बहुत ही ख़राब है” उस ब्यक्ति ने कहा| फिर गुरु उस व्यक्ति को पास के तालाब के पास ले गए| गुरु ने उस तालाब में भी  मुठ्ठी भर नमक डाल दिया फिर उस व्यक्ति से कहा – इस तालाब का पानी पीकर  बताओ की कैसा है| उस व्यक्ति ने तालाब का पानी पिया और बोला – गुरूजी यह तो बहुत ही मीठा है| गुरु ने कहा – “बेटा जीवन के दुःख भी इस मुठ्ठी भर नमक के समान ही है| जीवन में दुखों की मात्रा वही रहती है – न ज्यादा न कम| लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों का कितना स्वाद लेते है| यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी सोच एंव ज्ञान को गिलास की तरह सीमित रखकर रोज खारा पानी पीते है या फिर तालाब की तरह बनकर मीठा पा...

David and Goliath in Hindi

डेविड और गोलिएथ की कहानी किसी गाँव में गोलिएथ नामक दैत्य बार-बार आकर वहां के निवासियों को खा जाता था. एक दिन गाँव में डेविड नामक 15 वर्षीय गड़रिया अपने मित्र से मिलने के लिए आया. उसने अपने मित्र से पूछा – “तुम सभी मिलकर उस दैत्य का सामना क्यों नहीं करते?” भयभीत मित्र ने डेविड से कहा – “लगता है कि तुमने अभी गोलिएथ को देखा नहीं है. वह इतना विशाल है कि हम उसे मार नहीं सकते!” डेविड ने कहा – “अच्छा! यदि वह वाकई बहुत विशाल है तो इतना निश्चित है कि उसपर लगाया गया निशाना चूक नहीं सकता”. और कहते हैं कि डेविड ने एक दिन गोलिएथ पर गुलेल से निशाना साधकर उसे गिरा दिया और पलक झपकते ही उसे अपनी तलवार से मार दिया. इस कहानी में डेविड की शारीरिक शक्ति नहीं बल्कि उसके नज़रिए ने उसे गोलिएथ पर विजय दिलाई.

समस्या में ही हल होता है (SHAKE OFF YOUR PROBLEMS)

समस्या में ही हल होता है (To read this article in English please Click Here) एक बार एक आदमी का गधा एक गहरे गड्ढे में गिर गया. अनेक कोशिशों के बाद भी वह उस गधे को निकाल नहीं पाया इसलिए उसने उस गधे को जिंदा ही दफन करने का विचार किया. बहुत दुख के साथ उसने गधे के ऊपर मिट्टी डाली. गधे को मिट्टी का भार महसूस होने पर उसने अपने ऊपर से मिट्टी झाड दी और उस पर चढ़ गया. आदमी ने और मिट्टी डाली तो गधा फिर मिटटी आधार पर उस पर चढ़ गया. आदमी जितनी मिट्टी के डालता गधा उसे झाड़ पर उतना ही ऊपर आ जाता. दोपहर होने तक वह गधा बाहर निकल कर घास के मैदान में घास चढ़ने लगा. यदि हम अपने जीवन की समस्याओं को झाड़ कर उस पर चढ़ जाएं तो हमें भी हरे घास के मैदान दिखने लगेंगे.  हमें भी समस्याओं में ही उसका हल मिल जाएगा.

बन्दर और मूंगफलिया (Inspirational Story)

बन्दर और  मूंगफलिया एक बार एक बन्दर जंगल में घूम रहा था. तभी अचानक उसने रास्ते में एक लोहे का Box देखा. वो कुछ देर तक दूर से उसे देखता रहा, फिर अचानक वो उस Box के पास गया. उसने देखा उस Box में एक छोटा सा छेद है. उसने उस छेद में झाँक के देखा तो उसे उस Box में उसे बहुत सारी मूंगफलिया (Peanuts) दिखी. उसने उस छेद में अपना हाथ डाला और अपनी मुठ्ठी में, जितनी हो सकती थी उतनी मूंगफलिया भर ली. वो बन्दर  मूंगफलियों से भरा हाथ उस छेद से बहार निकालने की बहुत कोशिश करने लगा पर वो अपना हाथ नहीं निकाल पा रहा था. ऐसा इसलिए था क्यूकि वो छेद सिर्फ इतना ही बड़ा था की उसमे से खाली हाथ तो बाहर आ सकता था परन्तु बंद मुठ्ठी निकलने लायक नहीं. तभी कुछ देर बाद झाडियों में छिपे सभी शिकारी बहार आये और उसकी तरफ बढ़ने लगे. अब ये बन्दर का फैसला था कि वो मूंगफलियों का लालच छोड़ दे और आज़ाद हो जाए या फिर अपनी मुठ्ठी बंद रखे और पकड़ा जाए. लेकिन बन्दर ने अपना लालच नहीं छोड़ा और पकड़ा गया. दोस्तों हम सभी कही न कही इस बन्दर की तरह ही किसी न किसी लालच में अटक जाते हैं और यही लालच...