एक महात्मा भिक्षु भ्रमण करते हुए नगर में से गुज़र रहे थे। मार्ग में उन्हें एक रुपया मिला।
महात्मा तो विरक्त और संतोषी व्यक्ति थे। वे भला उसका क्या करते?
अतः उन्होंने किसी गरीब या दरिद्र को यह रुपया देने का विचार किया।
वे कई दिन तक तलाश करते रहे लेकिन उन्हें कोई दरिद्र नहीं मिला।
एक दिन उन्होंने देखा कि एक राजा अपनी सेना सहित दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा है।
साधु महात्मा ने वह रुपया राजा के ऊपर फेंक दिया।
इस पर राजा को नाराजगी भी हुई और साथ ही साथ आश्चर्य भी हुआ क्योंकि रुपया एक साधु ने फेंका था।
राजा ने साधु से ऐसा करने का कारण पूछा।
साधु ने धैर्य के साथ कहा- ‘राजन्! मैंने रास्ते में एक रुपया पाया, उसे किसी दरिद्र को देने का निश्चय किया। लेकिन मुझे तुम्हारे बराबर कोई दरिद्र व्यक्ति नहीं मिला, क्योंकि जो इतने बड़े राज्य का अधिपति होकर भी दूसरे राज्य पर चढ़ाई करने जा रहा हो और इसके लिए युद्ध में अपार संहार करने को उद्यत हो रहा हो, उससे ज्यादा दरिद्र कौन होगा?’
राजा का क्रोध शान्त हुआ और अपनी भूल पर पश्चात्ताप हुआ।
यूज राजा ने अपनी सेना पीछे ली और वापिस अपने देश को प्रस्थान किया।
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कहानी से प्रेरणा: संतोषी व्यक्ति को अपने पास जो साधन होते हैं, वे ही पर्याप्त लगते हैं। उसे और अधिक की भूख नहीं सताती। इसलिए हमें कर्म के साथ साथ संतोष भी रखना चाहिए।
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