एक समय एक गांव में एक बहुत विद्वान व्यक्ति रहते थे। वह ईमानदारी के लिए मशहूर थे। एक बार वह लंबी यात्रा के लिए समुद्री जहाज से निकले।
उन्होंने सोचा कि सफर में भजन व पानी के लिए कुछ धन रख लेना चाहिए। उनके पास काफी समय से बचाएं हुई एक हजार दीनार थी। उन्होंने को यात्रा के लिए साथ रख लिए।
यात्रा के दौरान उस ज्ञानी व्यक्ति की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वह उन सबको अच्छी अच्छी ज्ञान की बातें बताते गए।
एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं। एक दिन बातों-बातों में उस ज्ञानी व्यक्ति ने उसे दीनार की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया।
उसने उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई। एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, 'हाय मैं मार गया। मेरा एक हजार दीनार चोरी हो गया।' वह रोने लगा।
जहाज के कर्मचारियों ने कहा - 'तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।'
यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब उस ज्ञानी व्यक्ति की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, 'आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।’
यह सुन कर वह ज्ञानी व्यक्ति बोले - 'नहीं, जिसके दीनार चोरी हुए है उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।’ बुखारी की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।
दो दिनों के बाद उसी यात्री ने उदास मन से उस ज्ञानी व्यक्ति से पूछा, ‘आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?'
ज्ञानी व्यक्ति ने मुस्करा कर कहा, 'उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों?
क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं- एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास।
अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता।
मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।' उस यात्री ने उस ज्ञानी व्यक्ति से माफी मांगी।
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